ٱقْرَأْ بِٱسْمِ رَبِّكَ ٱلَّذِى خَلَقَ ﴿١﴾
(ऐ रसूल) अपने परवरदिगार का नाम लेकर पढ़ो जिसने हर (चीज़ को) पैदा किया
इस्लाम प्रकृति के अध्ययन को बढ़ावा देता है और उसे अल्लाह को जानने का एक रास्ता मानता है। क़ुरआन लोगों से ग़ौर करने और देखने का आग्रह करता है, और जब यूरोप अपने मध्य युग में था तब मुस्लिम आलिमों ने गणित, चिकित्सा, खगोलशास्त्र और प्रकाशिकी में बड़ा योगदान दिया।
क़ुरआन का पहला उतरा शब्द 'पढ़ो' था, क़ुरआन पूछता है 'क्या जानने वाले और न जानने वाले बराबर हैं?', और पैग़ंबर ﷺ ने फ़रमाया कि जो इल्म की तलाश में कोई राह चले, अल्लाह उसके लिए जन्नत की राह आसान कर देता है। 8वीं से 13वीं सदी के बीच इब्नुल-हैसम (प्रकाशिकी), अल-ख़्वारिज़्मी (बीजगणित), इब्ने सीना (चिकित्सा) और अल-बीरूनी जैसे आलिमों ने मुस्लिम दुनिया में विज्ञान को आगे बढ़ाया।
मुसलमान वह्य और ब्रह्मांड के अध्ययन के बीच कोई बुनियादी टकराव नहीं देखते, क्योंकि दोनों एक ही पैदा करने वाले से आते हैं। जहाँ वैज्ञानिक सिद्धांत क़ुरआन की बात से टकराते लगें, वहाँ मुसलमान आमतौर पर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि या तो सिद्धांत या व्याख्या अधूरी है। क्रमविकास और ब्रह्मांड की उम्र के सवालों पर मुसलमानों में चर्चा होती है, जैसा इस पन्ने के दूसरे सवाल दिखाते हैं।
ٱقْرَأْ بِٱسْمِ رَبِّكَ ٱلَّذِى خَلَقَ ﴿١﴾
(ऐ रसूल) अपने परवरदिगार का नाम लेकर पढ़ो जिसने हर (चीज़ को) पैदा किया
أَمَّنْ هُوَ قَٰنِتٌ ءَانَآءَ ٱلَّيْلِ سَاجِدًۭا وَقَآئِمًۭا يَحْذَرُ ٱلْءَاخِرَةَ وَيَرْجُوا۟ رَحْمَةَ رَبِّهِۦ ۗ قُلْ هَلْ يَسْتَوِى ٱلَّذِينَ يَعْلَمُونَ وَٱلَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ ۗ إِنَّمَا يَتَذَكَّرُ أُو۟لُوا۟ ٱلْأَلْبَٰبِ ﴿٩﴾
(आख़िर) तू यक़ीनी जहन्नुमियों में होगा क्या जो शख्स रात के अवक़ात में सजदा करके और खड़े-खड़े (खुदा की) इबादत करता हो और आख़ेरत से डरता हो अपने परवरदिगार की रहमत का उम्मीदवार हो (नाशुक्रे) काफिर के बराबर हो सकता है (ऐ रसूल) तुम पूछो तो कि भला कहीं जानने वाले और न जाननेवाले लोग बराबर हो सकते हैं (मगर) नसीहत इबरतें तो बस अक्लमन्द ही लोग मानते हैं
إِنَّ فِى خَلْقِ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَٱخْتِلَٰفِ ٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ لَءَايَٰتٍۢ لِّأُو۟لِى ٱلْأَلْبَٰبِ ﴿١٩٠﴾ ٱلَّذِينَ يَذْكُرُونَ ٱللَّهَ قِيَٰمًۭا وَقُعُودًۭا وَعَلَىٰ جُنُوبِهِمْ وَيَتَفَكَّرُونَ فِى خَلْقِ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ رَبَّنَا مَا خَلَقْتَ هَٰذَا بَٰطِلًۭا سُبْحَٰنَكَ فَقِنَا عَذَابَ ٱلنَّارِ ﴿١٩١﴾
इसमें तो शक ही नहीं कि आसमानों और ज़मीन की पैदाइश और रात दिन के फेर बदल में अक्लमन्दों के लिए (क़ुदरत ख़ुदा की) बहुत सी निशानियॉ हैं जो लोग उठते बैठते करवट लेते (अलगरज़ हर हाल में) ख़ुदा का ज़िक्र करते हैं और आसमानों और ज़मीन की बनावट में ग़ौर व फ़िक्र करते हैं और (बेसाख्ता) कह उठते हैं कि ख़ुदावन्दा तूने इसको बेकार पैदा नहीं किया तू (फेले अबस से) पाक व पाकीज़ा है बस हमको दोज़क के अज़ाब से बचा
इस जवाब के पीछे की हदीसें और रिवायतें। किसी नंबर को खोलकर उसे sunnah.com पर पढ़ें।
यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.