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विज्ञान, बुद्धि और संदेह

इस्लाम उस इंसान से क्या कहता है जिसे संदेह है या जो अल्लाह को नहीं मानता?

संक्षिप्त जवाब

इस्लाम सवालों का स्वागत करता है। क़ुरआन लोगों के संदेह उद्धृत करता है, और उसका जवाब है ग़ौर करना, सबूत ढूँढना और ईमानदार होना। वह यह भी कहता है कि हिदायत अल्लाह के हाथ में है और किसी को ईमान लाने पर मजबूर नहीं किया जा सकता।

विस्तृत जवाब

क़ुरआन में नबी इब्राहीम ने भी अल्लाह से कहा कि मुझे दिखा कि तू मुर्दों को कैसे ज़िंदा करता है, ताकि उनका दिल मुतमइन हो जाए, और अल्लाह ने उन्हें डाँटा नहीं। संदेह, जब वह खोज की ओर ले जाए, तो आदर के योग्य है। मुसलमानों से कहा गया है कि इनकार करने वालों को हिकमत और अच्छी बात से जवाब दें, और कहें 'तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन और मेरे लिए मेरा दीन'।

मुसलमान संदेह करने वाले को अल्लाह के पक्ष में सबूतों पर विचार करने, क़ुरआन को खुले मन से पढ़ने और हिदायत माँगने की दावत देगा। इसके आगे, मुसलमान को किसी के दिल का फ़ैसला करने या उससे तिरस्कार का बर्ताव करने का हक़ नहीं।

क़ुरआन से

وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِۦمُ رَبِّ أَرِنِى كَيْفَ تُحْىِ ٱلْمَوْتَىٰ ۖ قَالَ أَوَلَمْ تُؤْمِن ۖ قَالَ بَلَىٰ وَلَٰكِن لِّيَطْمَئِنَّ قَلْبِى ۖ قَالَ فَخُذْ أَرْبَعَةًۭ مِّنَ ٱلطَّيْرِ فَصُرْهُنَّ إِلَيْكَ ثُمَّ ٱجْعَلْ عَلَىٰ كُلِّ جَبَلٍۢ مِّنْهُنَّ جُزْءًۭا ثُمَّ ٱدْعُهُنَّ يَأْتِينَكَ سَعْيًۭا ۚ وَٱعْلَمْ أَنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌۭ ﴿٢٦٠﴾

और (ऐ रसूल) वह वाकेया भी याद करो जब इबराहीम ने (खुदा से) दरख्वास्त की कि ऐ मेरे परवरदिगार तू मुझे भी तो दिखा दे कि तू मुर्दों को क्योंकर ज़िन्दा करता है ख़ुदा ने फ़रमाया क्या तुम्हें (इसका) यक़ीन नहीं इबराहीम ने अर्ज़ की (क्यों नहीं) यक़ीन तो है मगर ऑंख से देखना इसलिए चाहता हूं कि मेरे दिल को पूरा इत्मिनान हो जाए फ़रमाया (अगर ये चाहते हो) तो चार परिन्दे लो और उनको अपने पास मॅगवा लो और टुकड़े टुकड़े कर डालो फिर हर पहाड़ पर उनका एक एक टुकड़ा रख दो उसके बाद उनको बुलाओ (फिर देखो तो क्यों कर वह सब के सब तुम्हारे पास दौड़े हुए आते हैं और समझ रखो कि ख़ुदा बेशक ग़ालिब और हिकमत वाला है

ٱدْعُ إِلَىٰ سَبِيلِ رَبِّكَ بِٱلْحِكْمَةِ وَٱلْمَوْعِظَةِ ٱلْحَسَنَةِ ۖ وَجَٰدِلْهُم بِٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ ۚ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَن ضَلَّ عَن سَبِيلِهِۦ ۖ وَهُوَ أَعْلَمُ بِٱلْمُهْتَدِينَ ﴿١٢٥﴾

(ऐ रसूल) तुम (लोगों को) अपने परवरदिगार की राह पर हिकमत और अच्छी अच्छी नसीहत के ज़रिए से बुलाओ और बहस व मुबाशा करो भी तो इस तरीक़े से जो लोगों के नज़दीक सबसे अच्छा हो इसमें शक़ नहीं कि जो लोग ख़ुदा की राह से भटक गए उनको तुम्हारा परवरदिगार खूब जानता है

لَكُمْ دِينُكُمْ وَلِىَ دِينِ ﴿٦﴾

तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मेरे लिए मेरा दीन

إِنَّكَ لَا تَهْدِى مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ يَهْدِى مَن يَشَآءُ ۚ وَهُوَ أَعْلَمُ بِٱلْمُهْتَدِينَ ﴿٥٦﴾

(ऐ रसूल) बेशक तुम जिसे चाहो मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचा सकते मगर हाँ जिसे खुदा चाहे मंज़िल मक़सूद तक पहुचाए और वही हिदायत याफ़ता लोगों से ख़ूब वाक़िफ़ है

कृपया ध्यान दें

यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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