इस्लाम सवालों का स्वागत करता है। क़ुरआन लोगों के संदेह उद्धृत करता है, और उसका जवाब है ग़ौर करना, सबूत ढूँढना और ईमानदार होना। वह यह भी कहता है कि हिदायत अल्लाह के हाथ में है और किसी को ईमान लाने पर मजबूर नहीं किया जा सकता।
विस्तृत जवाब
क़ुरआन में नबी इब्राहीम ने भी अल्लाह से कहा कि मुझे दिखा कि तू मुर्दों को कैसे ज़िंदा करता है, ताकि उनका दिल मुतमइन हो जाए, और अल्लाह ने उन्हें डाँटा नहीं। संदेह, जब वह खोज की ओर ले जाए, तो आदर के योग्य है। मुसलमानों से कहा गया है कि इनकार करने वालों को हिकमत और अच्छी बात से जवाब दें, और कहें 'तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन और मेरे लिए मेरा दीन'।
मुसलमान संदेह करने वाले को अल्लाह के पक्ष में सबूतों पर विचार करने, क़ुरआन को खुले मन से पढ़ने और हिदायत माँगने की दावत देगा। इसके आगे, मुसलमान को किसी के दिल का फ़ैसला करने या उससे तिरस्कार का बर्ताव करने का हक़ नहीं।
और (ऐ रसूल) वह वाकेया भी याद करो जब इबराहीम ने (खुदा से) दरख्वास्त की कि ऐ मेरे परवरदिगार तू मुझे भी तो दिखा दे कि तू मुर्दों को क्योंकर ज़िन्दा करता है ख़ुदा ने फ़रमाया क्या तुम्हें (इसका) यक़ीन नहीं इबराहीम ने अर्ज़ की (क्यों नहीं) यक़ीन तो है मगर ऑंख से देखना इसलिए चाहता हूं कि मेरे दिल को पूरा इत्मिनान हो जाए फ़रमाया (अगर ये चाहते हो) तो चार परिन्दे लो और उनको अपने पास मॅगवा लो और टुकड़े टुकड़े कर डालो फिर हर पहाड़ पर उनका एक एक टुकड़ा रख दो उसके बाद उनको बुलाओ (फिर देखो तो क्यों कर वह सब के सब तुम्हारे पास दौड़े हुए आते हैं और समझ रखो कि ख़ुदा बेशक ग़ालिब और हिकमत वाला है
(ऐ रसूल) तुम (लोगों को) अपने परवरदिगार की राह पर हिकमत और अच्छी अच्छी नसीहत के ज़रिए से बुलाओ और बहस व मुबाशा करो भी तो इस तरीक़े से जो लोगों के नज़दीक सबसे अच्छा हो इसमें शक़ नहीं कि जो लोग ख़ुदा की राह से भटक गए उनको तुम्हारा परवरदिगार खूब जानता है
यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.