وَٱلَّذِينَ جَٰهَدُوا۟ فِينَا لَنَهْدِيَنَّهُمْ سُبُلَنَا ۚ وَإِنَّ ٱللَّهَ لَمَعَ ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿٦٩﴾
और जिन लोगों ने हमारी राह में जिहाद किया उन्हें हम ज़रुर अपनी राह की हिदायत करेंगे और इसमें शक नही कि ख़ुदा नेकोकारों का साथी है
जिहाद का अर्थ है कोशिश या संघर्ष। इसमें भलाई के लिए हर प्रयास आता है: अपनी बुरी आदतों से संघर्ष, ईमानदार रहने की कोशिश, परिवार का पेट पालने के लिए मेहनत, किसी ज़ालिम के सामने सच बोलना और, आख़िरी उपाय के रूप में, कड़े नियमों के तहत हथियार से लोगों की रक्षा करना।
क़ुरआन और हदीस में इस शब्द के ज़्यादातर इस्तेमाल रोज़मर्रा के जीवन के संघर्ष के बारे में हैं: इल्म, सब्र और अच्छे अख़लाक़ के लिए। पैग़ंबर ﷺ ने सबसे अच्छे जिहाद को 'ज़ालिम हाकिम के सामने सच की बात' कहा, और उसे सच्चा योद्धा बताया जो अल्लाह की ख़ातिर अपने नफ़्स से लड़ता है। 'बड़े जिहाद' के बारे में, जो नफ़्स के ख़िलाफ़ है, बहुत दोहराई जाने वाली रिवायत की कड़ी कमज़ोर है, लेकिन उसके अर्थ को बहुत से प्रामाणिक ग्रंथों का समर्थन मिलता है।
सशस्त्र संघर्ष (क़िताल) जिहाद का एक हिस्सा है और केवल आक्रमण और अन्याय के विरुद्ध रक्षा में, किसी वैध सत्ता की मंज़ूरी से, और युद्ध के संचालन पर दृढ़ सीमाओं के साथ जायज़ है। इस्लाम में किसी व्यक्ति या समूह को अपने आप जिहाद का एलान करने का हक़ नहीं, और आम नागरिकों पर हमले कभी जिहाद नहीं होते।
وَٱلَّذِينَ جَٰهَدُوا۟ فِينَا لَنَهْدِيَنَّهُمْ سُبُلَنَا ۚ وَإِنَّ ٱللَّهَ لَمَعَ ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿٦٩﴾
और जिन लोगों ने हमारी राह में जिहाद किया उन्हें हम ज़रुर अपनी राह की हिदायत करेंगे और इसमें शक नही कि ख़ुदा नेकोकारों का साथी है
وَجَٰهِدُوا۟ فِى ٱللَّهِ حَقَّ جِهَادِهِۦ ۚ هُوَ ٱجْتَبَىٰكُمْ وَمَا جَعَلَ عَلَيْكُمْ فِى ٱلدِّينِ مِنْ حَرَجٍۢ ۚ مِّلَّةَ أَبِيكُمْ إِبْرَٰهِيمَ ۚ هُوَ سَمَّىٰكُمُ ٱلْمُسْلِمِينَ مِن قَبْلُ وَفِى هَٰذَا لِيَكُونَ ٱلرَّسُولُ شَهِيدًا عَلَيْكُمْ وَتَكُونُوا۟ شُهَدَآءَ عَلَى ٱلنَّاسِ ۚ فَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ وَٱعْتَصِمُوا۟ بِٱللَّهِ هُوَ مَوْلَىٰكُمْ ۖ فَنِعْمَ ٱلْمَوْلَىٰ وَنِعْمَ ٱلنَّصِيرُ ﴿٧٨﴾
ताकि तुम कामयाब हो और जो हक़ जिहाद करने का है खुदा की राह में जिहाद करो उसी नें तुमको बरगुज़ीदा किया और उमूरे दीन में तुम पर किसी तरह की सख्ती नहीं की तुम्हारे बाप इबराहीम ने मजहब को (तुम्हारा मज़हब बना दिया उसी (खुदा) ने तुम्हारा पहले ही से मुसलमान (फरमाबरदार बन्दे) नाम रखा और कुरान में भी (तो जिहाद करो) ताकि रसूल तुम्हारे मुक़ाबले में गवाह बने और तुम पाबन्दी से नामज़ पढ़ा करो और ज़कात देते रहो और खुदा ही (के एहकाम) को मज़बूत पकड़ो वही तुम्हारा सरपरस्त है तो क्या अच्छा सरपरस्त है और क्या अच्छा मददगार है
وَقَٰتِلُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ٱلَّذِينَ يُقَٰتِلُونَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوٓا۟ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلْمُعْتَدِينَ ﴿١٩٠﴾
और जो लोग तुम से लड़े तुम (भी) ख़ुदा की राह में उनसे लड़ो और ज्यादती न करो (क्योंकि) ख़ुदा ज्यादती करने वालों को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता
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