जिज़्या वह कर था जो मुस्लिम शासन में ग़ैर-मुस्लिम बालिग़ मर्द सैन्य सेवा और ज़कात की जगह देते थे, सुरक्षा और धार्मिक आज़ादी के बदले में। यह आस्था की सज़ा नहीं था, और ग़रीबों, औरतों, बच्चों और धर्मगुरुओं को इससे छूट थी।
विस्तृत जवाब
मुस्लिम नागरिक ज़कात देते थे और सेना में सेवा भी करते थे। ग़ैर-मुस्लिमों को दोनों से छूट थी और वे बदले में एक मामूली कर देते थे, और कई कालों में यह मुसलमानों के दिए से कम था। जब कोई राज्य उनकी रक्षा न कर पाता, जैसे जब मुस्लिम सेना बैज़ेंटाइनों के सामने हिम्स से पीछे हटी, तो जिज़्या लौटा दी गई।
यह व्यवस्था ज़्यादातर जगहों पर सदियों से इस्तेमाल में नहीं है। आज मुस्लिम आलिम आम तौर पर मानते हैं कि आधुनिक राज्य के सभी नागरिक बराबर के नागरिक हैं जिनके कर्तव्य समान हैं, और जब सब पर एक जैसा कर लगता है और सब सेना में सेवा करते हैं तो जिज़्या का कोई स्थान नहीं। इतिहास में भेदभाव के उदाहरण दर्ज हैं, और क़ुरआन का नियम है लोगों के साथ इंसाफ़ से पेश आना।
अहले किताब में से जो लोग न तो (दिल से) ख़ुदा ही पर ईमान रखते हैं और न रोज़े आख़िरत पर और न ख़ुदा और उसके रसूल की हराम की हुई चीज़ों को हराम समझते हैं और न सच्चे दीन ही को एख्तियार करते हैं उन लोगों से लड़े जाओ यहाँ तक कि वह लोग ज़लील होकर (अपने) हाथ से जज़िया दे
जो लोग तुमसे तुम्हारे दीन के बारे में नहीं लड़े भिड़े और न तुम्हें घरों से निकाले उन लोगों के साथ एहसान करने और उनके साथ इन्साफ़ से पेश आने से ख़ुदा तुम्हें मना नहीं करता बेशक ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है
स्रोत
इस जवाब के पीछे की हदीसें और रिवायतें। किसी नंबर को खोलकर उसे sunnah.com पर पढ़ें।
The return of the jizya at Homs: Abu Yusuf, Kitab al-Kharaj.
यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.