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शांति, युद्ध, जिहाद और हिंसा

क्या इस्लाम शांति का धर्म है?

संक्षिप्त जवाब

इस्लाम शांति को अपना लक्ष्य बताता है, और हर मुसलमान का अभिवादन है 'आप पर सलामती हो'। वह कड़े नियमों के तहत रक्षात्मक लड़ाई की इजाज़त भी देता है, जैसा ज़्यादातर धर्म और राष्ट्र करते हैं। चरमपंथियों द्वारा उसके नाम पर की गई हिंसा की मुस्लिम आलिमों का भारी बहुमत निंदा करता है।

विस्तृत जवाब

इस्लाम शब्द की जड़ सलाम, यानी शांति, से मिलती है। क़ुरआन सिखाता है कि एक इंसान को नाहक़ क़त्ल करना सारी इंसानियत को क़त्ल करने जैसा है, और एक जान बचाना सारी इंसानियत को बचाने जैसा है। वह मुसलमानों से कहता है कि जब दूसरा पक्ष शांति की ओर झुके तो वे भी झुकें, और बुराई का बदला भलाई से दें।

मुसलमान यह भी कहते हैं कि इतिहास में शांति और युद्ध दोनों दिखते हैं, जैसे हर सभ्यता में। किसी धर्म की शिक्षा को उसके ग्रंथों और उसके मुख्यधारा के आलिमों से परखना चाहिए, आईएसआईएस और अल-क़ायदा जैसे समूहों के बर्ताव से नहीं, जिनकी दुनिया भर के मुस्लिम आलिमों ने निंदा की है और जिनके शिकार ज़्यादातर मुसलमान हैं। क़ुरआन का निष्पक्ष पाठक ऐसे युद्ध-नियम पाएगा जो आम नागरिकों की रक्षा करते हैं, और इंसाफ़, रहमत और माफ़ी की एक मज़बूत पुकार।

क़ुरआन से

مِنْ أَجْلِ ذَٰلِكَ كَتَبْنَا عَلَىٰ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ أَنَّهُۥ مَن قَتَلَ نَفْسًۢا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍۢ فِى ٱلْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ ٱلنَّاسَ جَمِيعًۭا وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَآ أَحْيَا ٱلنَّاسَ جَمِيعًۭا ۚ وَلَقَدْ جَآءَتْهُمْ رُسُلُنَا بِٱلْبَيِّنَٰتِ ثُمَّ إِنَّ كَثِيرًۭا مِّنْهُم بَعْدَ ذَٰلِكَ فِى ٱلْأَرْضِ لَمُسْرِفُونَ ﴿٣٢﴾

इसी सबब से तो हमने बनी इसराईल पर वाजिब कर दिया था कि जो शख्स किसी को न जान के बदले में और न मुल्क में फ़साद फैलाने की सज़ा में (बल्कि नाहक़) क़त्ल कर डालेगा तो गोया उसने सब लोगों को क़त्ल कर डाला और जिसने एक आदमी को जिला दिया तो गोया उसने सब लोगों को जिला लिया और उन (बनी इसराईल) के पास तो हमारे पैग़म्बर (कैसे कैसे) रौशन मौजिज़े लेकर आ चुके हैं (मगर) फिर उसके बाद भी यक़ीनन उसमें से बहुतेरे ज़मीन पर ज्यादतियॉ करते रहे

۞ وَإِن جَنَحُوا۟ لِلسَّلْمِ فَٱجْنَحْ لَهَا وَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ ﴿٦١﴾

और अगर ये कुफ्फार सुलह की तरफ माएल हो तो तुम भी उसकी तरफ माएल हो और ख़ुदा पर भरोसा रखो (क्योंकि) वह बेशक (सब कुछ) सुनता जानता है

وَلَا تَسْتَوِى ٱلْحَسَنَةُ وَلَا ٱلسَّيِّئَةُ ۚ ٱدْفَعْ بِٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ فَإِذَا ٱلَّذِى بَيْنَكَ وَبَيْنَهُۥ عَدَٰوَةٌۭ كَأَنَّهُۥ وَلِىٌّ حَمِيمٌۭ ﴿٣٤﴾

और भलाई बुराई (कभी) बराबर नहीं हो सकती तो (सख्त कलामी का) ऐसे तरीके से जवाब दो जो निहायत अच्छा हो (ऐसा करोगे) तो (तुम देखोगे) जिस में और तुममें दुशमनी थी गोया वह तुम्हारा दिल सोज़ दोस्त है

يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَٰكُم مِّن ذَكَرٍۢ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَٰكُمْ شُعُوبًۭا وَقَبَآئِلَ لِتَعَارَفُوٓا۟ ۚ إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ ٱللَّهِ أَتْقَىٰكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌۭ ﴿١٣﴾

लोगों हमने तो तुम सबको एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और हम ही ने तुम्हारे कबीले और बिरादरियाँ बनायीं ताकि एक दूसरे की शिनाख्त करे इसमें शक़ नहीं कि ख़ुदा के नज़दीक तुम सबमें बड़ा इज्ज़तदार वही है जो बड़ा परहेज़गार हो बेशक ख़ुदा बड़ा वाक़िफ़कार ख़बरदार है

कृपया ध्यान दें

यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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