नहीं। बेगुनाह लोगों को क़त्ल करना, चाहे मुसलमान हों या नहीं, इस्लाम में सबसे बड़े गुनाहों में से है। क़ुरआन कहता है कि जिसने किसी जान को नाहक़ क़त्ल किया, गोया उसने सारी इंसानियत को क़त्ल कर दिया।
विस्तृत जवाब
आतंकवाद, यानी डर फैलाने के लिए जान-बूझकर आम नागरिकों को निशाना बनाना, का क़ुरआन या सुन्नत में कोई आधार नहीं। पैग़ंबर ﷺ ने फ़रमाया, 'जिसने किसी ऐसे इंसान को क़त्ल किया जो सुरक्षा की संधि के अंतर्गत है, वह जन्नत की ख़ुशबू तक न सूँघेगा।' आत्महत्या हराम है, इसलिए 'आत्मघाती बम' का इस्लामी आधार नहीं है, और सभी मसलकों के आलिमों ने, अल-अज़हर से सऊदी अरब और देवबंद तक, 9/11 जैसे हमलों की निंदा की है और बहुतों ने उनके ख़िलाफ़ फ़तवे जारी किए हैं।
चरमपंथी समूह आयतों को संदर्भ से काटकर उद्धृत करते हैं और मुस्लिम मुख्यधारा ने उन्हें ठुकराया है। आतंकवाद के शिकार ज़्यादातर मुसलमान हैं। यह पूछना जायज़ है कि मुस्लिम दुनिया में ऐसे समूह क्यों हैं, और जवाबों में युद्ध, राजनीति, ग़रीबी और धर्म की ग़लत व्याख्याएँ शामिल हैं, लेकिन इस्लामी हुक्म साफ़ है।
इसी सबब से तो हमने बनी इसराईल पर वाजिब कर दिया था कि जो शख्स किसी को न जान के बदले में और न मुल्क में फ़साद फैलाने की सज़ा में (बल्कि नाहक़) क़त्ल कर डालेगा तो गोया उसने सब लोगों को क़त्ल कर डाला और जिसने एक आदमी को जिला दिया तो गोया उसने सब लोगों को जिला लिया और उन (बनी इसराईल) के पास तो हमारे पैग़म्बर (कैसे कैसे) रौशन मौजिज़े लेकर आ चुके हैं (मगर) फिर उसके बाद भी यक़ीनन उसमें से बहुतेरे ज़मीन पर ज्यादतियॉ करते रहे
और जिस जान का मारना ख़ुदा ने हराम कर दिया है उसके क़त्ल न करना मगर जायज़ तौर पर और जो शख़्श नाहक़ मारा जाए तो हमने उसके वारिस को (क़ातिल पर क़सास का क़ाबू दिया है तो उसे चाहिए कि क़त्ल (ख़ून का बदला लेने) में ज्यादती न करे बेशक वह मदद दिया जाएगा
(ऐ रसूल) तुम उनसे कहो कि (बेबस) आओ जो चीज़ें ख़ुदा ने तुम पर हराम की हैं वह मैं तुम्हें पढ़ कर सुनाऊँ (वह) यह कि किसी चीज़ को ख़ुदा का शरीक़ न बनाओ और माँ बाप के साथ नेक सुलूक़ करो और मुफ़लिसी के ख़ौफ से अपनी औलाद को मार न डालना (क्योंकि) उनको और तुमको रिज़क देने वाले तो हम हैं और बदकारियों के क़रीब भी न जाओ ख्वाह (चाहे) वह ज़ाहिर हो या पोशीदा और किसी जान वाले को जिस के क़त्ल को ख़ुदा ने हराम किया है न मार डालना मगर (किसी) हक़ के ऐवज़ में वह बातें हैं जिनका ख़ुदा ने तुम्हें हुक्म दिया है ताकि तुम लोग समझो और यतीम के माल के करीब भी न जाओ
ए ईमानवालों आपस में एक दूसरे का माल नाहक़ न खा जाया करो लेकिन (हॉ) तुम लोगों की बाहमी रज़ामन्दी से तिजारत हो (और उसमें एक दूसरे का माल हो तो मुज़ाएक़ा नहीं) और अपना गला आप घूंट के अपनी जान न दो (क्योंकि) ख़ुदा तो ज़रूर तुम्हारे हाल पर मेहरबान है
स्रोत
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यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.