فَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْرًۭا يَرَهُۥ ﴿٧﴾ وَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍۢ شَرًّۭا يَرَهُۥ ﴿٨﴾
तो जिस शख्स ने ज़र्रा बराबर नेकी की वह उसे देख लेगा और जिस शख्स ने ज़र्रा बराबर बदी की है तो उसे देख लेगा
मुसलमान मानते हैं कि मौत अंत नहीं है। क़यामत के दिन सब को उठाया जाएगा, वे अल्लाह के सामने खड़े होंगे और पूरे इंसाफ़ के साथ उनका फ़ैसला होगा, नेक लोग जन्नत में जाएँगे और जिन्होंने सच को ठुकराया और ग़लत किया उन्हें सज़ा मिलेगी, अल्लाह की रहमत के अधीन।
मौत के बाद रूह बरज़ख़ नाम की अवस्था में क़यामत के दिन तक इंतज़ार करती है। उस दिन आमाल तौले जाते हैं, और हर इंसान को उसका आमालनामा मिलता है। क़ुरआन कहता है कि जिसने ज़र्रा बराबर भलाई की वह उसे देखेगा, और जिसने ज़र्रा बराबर बुराई की वह उसे देखेगा।
मुसलमान मानते हैं कि अल्लाह सबसे बड़ा रहम करने वाला है, इसलिए नेकी कई गुना बढ़ाई जाती है और बुराई एक ही गिनी जाती है, और जो तौबा करे उसे माफ़ किया जाता है। मुसलमान उम्मीद रखते हैं कि अल्लाह की रहमत उनके गुनाहों से बड़ी होगी, और साथ ही उसके इंसाफ़ से डरते भी हैं, और उम्मीद और डर का यह संतुलन उनके जीने के ढंग को आकार देता है।
فَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْرًۭا يَرَهُۥ ﴿٧﴾ وَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍۢ شَرًّۭا يَرَهُۥ ﴿٨﴾
तो जिस शख्स ने ज़र्रा बराबर नेकी की वह उसे देख लेगा और जिस शख्स ने ज़र्रा बराबर बदी की है तो उसे देख लेगा
كُلُّ نَفْسٍۢ ذَآئِقَةُ ٱلْمَوْتِ ۗ وَإِنَّمَا تُوَفَّوْنَ أُجُورَكُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَٰمَةِ ۖ فَمَن زُحْزِحَ عَنِ ٱلنَّارِ وَأُدْخِلَ ٱلْجَنَّةَ فَقَدْ فَازَ ۗ وَمَا ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَآ إِلَّا مَتَٰعُ ٱلْغُرُورِ ﴿١٨٥﴾
हर जान एक न एक (दिन) मौत का मज़ा चखेगी और तुम लोग क़यामत के दिन (अपने किए का) पूरा पूरा बदला भर पाओगे पस जो शख्स जहन्नुम से हटा दिया गया और बहिश्त में पहुंचा दिया गया पस वही कामयाब हुआ और दुनिया की (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी धोखे की टट्टी के सिवा कुछ नहीं
وَنَضَعُ ٱلْمَوَٰزِينَ ٱلْقِسْطَ لِيَوْمِ ٱلْقِيَٰمَةِ فَلَا تُظْلَمُ نَفْسٌۭ شَيْـًۭٔا ۖ وَإِن كَانَ مِثْقَالَ حَبَّةٍۢ مِّنْ خَرْدَلٍ أَتَيْنَا بِهَا ۗ وَكَفَىٰ بِنَا حَٰسِبِينَ ﴿٤٧﴾
और क़यामत के दिन तो हम (बन्दों के भले बुरे आमाल तौलने के लिए) इन्साफ़ की तराज़ू में खड़ी कर देंगे तो फिर किसी शख्स पर कुछ भी ज़ुल्म न किया जाएगा और अगर राई के दाने के बराबर भी किसी का (अमल) होगा तो तुम उसे ला हाज़िर करेंगे और हम हिसाब करने के वास्ते बहुत काफ़ी हैं
यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.