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नमाज़, रोज़ा, हज और इबादत

मुसलमान रोज़े में पानी क्यों नहीं पी सकते? क्या यह नुक़सानदेह है?

संक्षिप्त जवाब

रमज़ान के रोज़े का अर्थ है फ़ज्र से सूर्यास्त तक खाने और पानी से रुकना, जैसा क़ुरआन हुक्म देता है। सेहतमंद बड़ों के लिए यह सुरक्षित है, और इस्लाम हर उस इंसान को छूट देता है जिसके लिए यह नुक़सानदेह हो।

विस्तृत जवाब

एक महीने तक 12 से 17 घंटे रोज़ा रखना, फ़ज्र से पहले एक भोजन और सूर्यास्त पर एक भोजन के साथ, दुनिया का एक चौथाई हिस्सा करता है और सेहतमंद लोगों को कोई नुक़सान नहीं होता। रुक-रुककर उपवास (इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग) पर शोध बताता है कि यह ज़्यादातर सेहतमंद बड़ों के लिए सुरक्षित है।

इस्लाम नुक़सान नहीं चाहता: क़ुरआन कहता है कि अल्लाह तुम्हारे लिए आसानी चाहता है, सख़्ती नहीं। जो बीमार हैं, बुज़ुर्ग और कमज़ोर हैं, सफ़र में हैं, या गर्भवती और दूध पिलाने वाली हैं, वे रोज़ा छोड़कर बाद में दिन पूरे कर सकते हैं, या अगर वे हमेशा के लिए असमर्थ हैं तो हर दिन के बदले एक ग़रीब को खाना खिलाएँ। डायबिटीज़ या दूसरी बीमारियों वाले को अपने डॉक्टर की सलाह माननी चाहिए। आपात स्थिति में जान बचाने के लिए पानी पीना ज़रूरी है।

क़ुरआन से

شَهْرُ رَمَضَانَ ٱلَّذِىٓ أُنزِلَ فِيهِ ٱلْقُرْءَانُ هُدًۭى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَٰتٍۢ مِّنَ ٱلْهُدَىٰ وَٱلْفُرْقَانِ ۚ فَمَن شَهِدَ مِنكُمُ ٱلشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ ۖ وَمَن كَانَ مَرِيضًا أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍۢ فَعِدَّةٌۭ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ ۗ يُرِيدُ ٱللَّهُ بِكُمُ ٱلْيُسْرَ وَلَا يُرِيدُ بِكُمُ ٱلْعُسْرَ وَلِتُكْمِلُوا۟ ٱلْعِدَّةَ وَلِتُكَبِّرُوا۟ ٱللَّهَ عَلَىٰ مَا هَدَىٰكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ ﴿١٨٥﴾

(रोज़ों का) महीना रमज़ान है जिस में क़ुरान नाज़िल किया गया जो लोगों का रहनुमा है और उसमें रहनुमाई और (हक़ व बातिल के) तमीज़ की रौशन निशानियाँ हैं (मुसलमानों) तुम में से जो शख्स इस महीनें में अपनी जगह पर हो तो उसको चाहिए कि रोज़ा रखे और जो शख्स बीमार हो या फिर सफ़र में हो तो और दिनों में रोज़े की गिनती पूरी करे ख़ुदा तुम्हारे साथ आसानी करना चाहता है और तुम्हारे साथ सख्ती करनी नहीं चाहता और (शुमार का हुक्म इस लिए दिया है) ताकि तुम (रोज़ो की) गिनती पूरी करो और ताकि ख़ुदा ने जो तुम को राह पर लगा दिया है उस नेअमत पर उस की बड़ाई करो और ताकि तुम शुक्र गुज़ार बनो

أَيَّامًۭا مَّعْدُودَٰتٍۢ ۚ فَمَن كَانَ مِنكُم مَّرِيضًا أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍۢ فَعِدَّةٌۭ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ ۚ وَعَلَى ٱلَّذِينَ يُطِيقُونَهُۥ فِدْيَةٌۭ طَعَامُ مِسْكِينٍۢ ۖ فَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًۭا فَهُوَ خَيْرٌۭ لَّهُۥ ۚ وَأَن تَصُومُوا۟ خَيْرٌۭ لَّكُمْ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿١٨٤﴾

(वह भी हमेशा नहीं बल्कि) गिनती के चन्द रोज़ इस पर भी (रोज़े के दिनों में) जो शख्स तुम में से बीमार हो या सफर में हो तो और दिनों में जितने क़ज़ा हुए हो) गिन के रख ले और जिन्हें रोज़ा रखने की कूवत है और न रखें तो उन पर उस का बदला एक मोहताज को खाना खिला देना है और जो शख्स अपनी ख़ुशी से भलाई करे तो ये उस के लिए ज्यादा बेहतर है और अगर तुम समझदार हो तो (समझ लो कि फिदये से) रोज़ा रखना तुम्हारे हक़ में बहरहाल अच्छा है

कृपया ध्यान दें

यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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