ज़कात एक न्यूनतम सीमा (निसाब) से ऊपर की बचत और दौलत पर हर साल 2.5% का दान है, और यह इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है। यह ग़रीबों और दूसरे ज़रूरतमंदों को दिया जाता है, और इंसान के माल और दिल को पाक करता है।
विस्तृत जवाब
क़ुरआन आठ समूहों की सूची देता है जिन्हें ज़कात दी जा सकती है, जिनमें ग़रीब, मोहताज, क़र्ज़दार, ज़रूरतमंद मुसाफ़िर और इसे इकट्ठा करने और बाँटने का काम करने वाले, और ग़ुलामों को आज़ाद कराना शामिल हैं। यह अमीरों के माल में ग़रीबों का हक़ है, कोई एहसान नहीं।
फ़र्ज़ ज़कात के अलावा इस्लाम किसी भी समय स्वैच्छिक दान (सदक़ा) को बढ़ावा देता है, जैसे किसी को खाना खिलाना, पड़ोसी की मदद करना या मुस्कुरा देना भी। पैग़ंबर ﷺ ने फ़रमाया कि दान से माल घटता नहीं। ज़कात इतिहास की सबसे शुरुआती सामाजिक कल्याण व्यवस्थाओं में से एक रही है।
(तो उनका क्या कहना था) ख़ैरात तो बस ख़ास फकीरों का हक़ है और मोहताजों का और उस (ज़कात वग़ैरह) के कारिन्दों का और जिनकी तालीफ़ क़लब की गई है (उनका) और (जिन की) गर्दनों में (गुलामी का फन्दा पड़ा है उनका) और ग़द्दारों का (जो ख़ुदा से अदा नहीं कर सकते) और खुदा की राह (जिहाद) में और परदेसियों की किफ़ालत में ख़र्च करना चाहिए ये हुकूक़ ख़ुदा की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और ख़ुदा बड़ा वाक़िफ कार हिकमत वाला है
जो लोग अपने माल खुदा की राह में खर्च करते हैं उनके (खर्च) की मिसाल उस दाने की सी मिसाल है जिसकी सात बालियॉ निकलें (और) हर बाली में सौ (सौ) दाने हों और ख़ुदा जिसके लिये चाहता है दूना कर देता है और खुदा बड़ी गुन्जाइश वाला (हर चीज़ से) वाक़िफ़ है
यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.