पाँच स्तंभ वे मुख्य इबादतें हैं जो हर मुसलमान करता है: ईमान की गवाही (शहादा), दिन की पाँच नमाज़ें (सलात), दान देना (ज़कात), रमज़ान में रोज़ा रखना (सौम) और जो सक्षम हो उसके लिए जीवन में एक बार मक्का की यात्रा (हज)।
विस्तृत जवाब
शहादा यह कहना और मानना है कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद उसके रसूल हैं। नमाज़ दिन में पाँच बार निश्चित समय पर अदा की जाती है। ज़कात बचत के एक न्यूनतम स्तर से ऊपर की रक़म का हर साल 2.5% ज़रूरतमंदों को दिया जाने वाला दान है। रोज़े का अर्थ है रमज़ान के महीने में फ़ज्र से सूर्यास्त तक खाने, पीने और पति-पत्नी के संबंध से रुकना।
हज मक्का में काबा की यात्रा है, जो एक बार उस इंसान पर फ़र्ज़ है जिसके पास इसके लिए सेहत और पैसा हो। पैग़ंबर ﷺ ने इस्लाम की तुलना एक इमारत से की जो इन पाँच स्तंभों पर खड़ी है। ये मुसलमान के अमल का ढाँचा हैं, और अच्छे अख़लाक़ और नेक कामों से इमारत का बाक़ी हिस्सा भरता है।
नेकी कुछ यही थोड़ी है कि नमाज़ में अपने मुँह पूरब या पश्चिम की तरफ़ कर लो बल्कि नेकी तो उसकी है जो ख़ुदा और रोज़े आख़िरत और फ़रिश्तों और ख़ुदा की किताबों और पैग़म्बरों पर ईमान लाए और उसकी उलफ़त में अपना माल क़राबत दारों और यतीमों और मोहताजो और परदेसियों और माँगने वालों और लौन्डी ग़ुलाम (के गुलू खलासी) में सर्फ करे और पाबन्दी से नमाज़ पढे और ज़कात देता रहे और जब कोई एहद किया तो अपने क़ौल के पूरे हो और फ़क्र व फाक़ा रन्ज और घुटन के वक्त साबित क़दम रहे यही लोग वह हैं जो दावए ईमान में सच्चे निकले और यही लोग परहेज़गार है
स्रोत
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