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नमाज़, रोज़ा, हज और इबादत

मुसलमान दिन में पाँच बार नमाज़ क्यों पढ़ते हैं?

संक्षिप्त जवाब

मुसलमान फ़ज्र, दोपहर, तीसरे पहर, सूर्यास्त और रात में नमाज़ पढ़ते हैं, क्योंकि अल्लाह ने निश्चित समयों पर नमाज़ का हुक्म दिया है, और यह इंसान को पूरे दिन उससे जोड़े रखती है। हर नमाज़ में बस कुछ ही मिनट लगते हैं।

विस्तृत जवाब

क़ुरआन कहता है कि नमाज़ ईमान वालों पर निश्चित समयों पर फ़र्ज़ की गई है। पाँच नमाज़ें हैं फ़ज्र (भोर), ज़ुहर (दोपहर ढलने के बाद), अस्र (तीसरा पहर), मग़रिब (सूर्यास्त के ठीक बाद) और इशा (रात)। हर नमाज़ से पहले मुसलमान वुज़ू करता है, मक्का के काबा की ओर रुख़ करता है और क़ुरआन की आयतें पढ़ता है, खड़ा होता है, झुकता है और माथा ज़मीन पर रखकर सजदा करता है।

मुसलमान नमाज़ को व्यस्त दिन में एक ठहराव मानते हैं जिसमें अल्लाह को याद करें, मार्गदर्शन माँगें, उसका शुक्र अदा करें और अपनी चिंताएँ उसके हवाले कर दें। यह इंसान को विनम्र भी रखती है, क्योंकि दौलत और ओहदे की परवाह किए बिना सब एक ही सफ़ों में खड़े होते हैं। आप इसी वेबसाइट पर किसी भी शहर की नमाज़ का समय देख सकते हैं।

क़ुरआन से

فَإِذَا قَضَيْتُمُ ٱلصَّلَوٰةَ فَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ قِيَٰمًۭا وَقُعُودًۭا وَعَلَىٰ جُنُوبِكُمْ ۚ فَإِذَا ٱطْمَأْنَنتُمْ فَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ ۚ إِنَّ ٱلصَّلَوٰةَ كَانَتْ عَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ كِتَٰبًۭا مَّوْقُوتًۭا ﴿١٠٣﴾

फिर जब तुम नमाज़ अदा कर चुको तो उठते बैठते लेटते (ग़रज़ हर हाल में) ख़ुदा को याद करो फिर जब तुम (दुश्मनों से) मुतमईन हो जाओ तो (अपने मअमूल) के मुताबिक़ नमाज़ पढ़ा करो क्योंकि नमाज़ तो ईमानदारों पर वक्त मुतय्यन करके फ़र्ज़ की गयी है

ٱتْلُ مَآ أُوحِىَ إِلَيْكَ مِنَ ٱلْكِتَٰبِ وَأَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَ ۖ إِنَّ ٱلصَّلَوٰةَ تَنْهَىٰ عَنِ ٱلْفَحْشَآءِ وَٱلْمُنكَرِ ۗ وَلَذِكْرُ ٱللَّهِ أَكْبَرُ ۗ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ مَا تَصْنَعُونَ ﴿٤٥﴾

(ऐ रसूल) जो किताब तुम्हारे पास नाज़िल की गयी है उसकी तिलावत करो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ो बेशक नमाज़ बेहयाई और बुरे कामों से बाज़ रखती है और ख़ुदा की याद यक़ीनी बड़ा मरतबा रखती है और तुम लोग जो कुछ करते हो ख़ुदा उससे वाक़िफ है

إِنَّنِىٓ أَنَا ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّآ أَنَا۠ فَٱعْبُدْنِى وَأَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَ لِذِكْرِىٓ ﴿١٤﴾

इसमें शक नहीं कि मैं ही वह अल्लाह हूँ कि मेरे सिवा कोई माबूद नहीं तो मेरी ही इबादत करो और मेरी याद के लिए नमाज़ बराबर पढ़ा करो

कृपया ध्यान दें

यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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