मुसलमान छह चीज़ों पर ईमान रखते हैं: एक अल्लाह, उसके फ़रिश्ते, उसकी किताबें, उसके रसूल, क़यामत का दिन, और यह कि अल्लाह सब कुछ जानता है और उसने सब कुछ लिख रखा है (तक़दीर)। इन्हें मिलाकर ईमान के छह स्तंभ कहा जाता है।
विस्तृत जवाब
एक अल्लाह पर ईमान का अर्थ है केवल उसी की इबादत करना, बिना मूर्तियों, संतों या बिचौलियों के। फ़रिश्तों पर ईमान का अर्थ है नूर से बने वे अनदेखे जीव जो अल्लाह का हुक्म मानते हैं। किताबों पर ईमान का अर्थ है तौरात, इंजील और ज़बूर जैसी वह्य को उनके मूल रूप में मानना, और क़ुरआन को आख़िरी किताब मानना।
रसूलों पर ईमान का अर्थ है आदम से लेकर मुहम्मद ﷺ तक सभी नबियों को मानना, जिनका मुसलमान आदर करते हैं और उनके बीच कोई फ़र्क़ नहीं करते। क़यामत के दिन पर ईमान का अर्थ है कि हर इंसान को उठाया जाएगा और पूरे इंसाफ़ के साथ उसका हिसाब होगा। तक़दीर पर ईमान का अर्थ है कि कुछ भी अल्लाह के इल्म से बाहर नहीं होता, फिर भी इंसान को असली इख़्तियार है और वह अपने कामों का ज़िम्मेदार है।
हमारे पैग़म्बर (मोहम्मद) जो कुछ उनपर उनके परवरदिगार की तरफ से नाज़िल किया गया है उस पर ईमान लाए और उनके (साथ) मोमिनीन भी (सबके) सब ख़ुदा और उसके फ़रिश्तों और उसकी किताबों और उसके रसूलों पर ईमान लाए (और कहते हैं कि) हम ख़ुदा के पैग़म्बरों में से किसी में तफ़रक़ा नहीं करते और कहने लगे ऐ हमारे परवरदिगार हमने (तेरा इरशाद) सुना
ऐ ईमानवालों ख़ुदा और उसके रसूल (मोहम्मद) पर और उसकी किताब पर जो उसने अपने रसूल (मोहम्मद) पर नाज़िल की है और उस किताब पर जो उसने पहले नाज़िल की ईमान लाओ और (ये भी याद रहे कि) जो शख्स ख़ुदा और उसके फ़रिश्तों और उसकी किताबों और उसके रसूलों और रोज़े आख़िरत का मुन्किर हुआ तो वह राहे रास्त से भटक के जूर जा पड़ा
यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.