नहीं। इस्लाम विवाह में ज़्यादती को हराम करता है। पैग़ंबर ﷺ ने कभी किसी औरत या नौकर पर हाथ नहीं उठाया, और उन्होंने फ़रमाया, 'तुममें सबसे अच्छे वे हैं जो अपनी पत्नियों के लिए सबसे अच्छे हैं।' जिस आयत (4:34) का हवाला दिया जाता है उसे व्यापक रूप से ग़लत पढ़ा जाता है।
विस्तृत जवाब
आयत 4:34 पति के लिए उस स्थिति में क़दमों की सूची देती है जब पत्नी बेवफ़ा हो: नसीहत करे, फिर बिस्तर में अलग हो जाए और, आख़िरी क़दम के रूप में, 'ज़रबा'। इतिहास भर में आलिमों ने कहा कि यह नुक़सान की इजाज़त नहीं देता। पैग़ंबर ﷺ ने मारने को नापसंद किया और कहा 'जो ऐसा करते हैं वे तुममें सबसे अच्छे नहीं हैं'। जिन्होंने इसे बिल्कुल भी जायज़ कहा, जैसे कुछ शास्त्रीय फ़क़ीह, उन्होंने कहा कि यह प्रतीकात्मक होना चाहिए, जैसे मिस्वाक से, उससे दर्द न हो और निशान न पड़े, और यह चेहरे पर कभी न हो। बहुत से आधुनिक आलिम 'ज़रबा' का अर्थ अलग होना या छोड़ देना पढ़ते हैं।
जो बात पक्की है वह यह है कि मुसलमानों को आदेश है कि अपनी पत्नियों के साथ भलाई से रहें, और शारीरिक या मानसिक नुक़सान पहुँचाना हराम है। घरेलू हिंसा एक जुर्म है जिसे कोई मुसलमान ईमान के नाम पर सही नहीं ठहरा सकता, और पीड़ितों को मदद और सुरक्षा माँगने की प्रेरणा दी जाती है।
मर्दो का औरतों पर क़ाबू है क्योंकि (एक तो) ख़ुदा ने बाज़ आदमियों (मर्द) को बाज़ अदमियों (औरत) पर फ़ज़ीलत दी है और (इसके अलावा) चूंकि मर्दो ने औरतों पर अपना माल ख़र्च किया है पस नेक बख्त बीवियॉ तो शौहरों की ताबेदारी करती हैं (और) उनके पीठ पीछे जिस तरह ख़ुदा ने हिफ़ाज़त की वह भी (हर चीज़ की) हिफ़ाज़त करती है और वह औरतें जिनके नाफरमान सरकश होने का तुम्हें अन्देशा हो तो पहले उन्हें समझाओ और (उसपर न माने तो) तुम उनके साथ सोना छोड़ दो और (इससे भी न माने तो) मारो मगर इतना कि खून न निकले और कोई अज़ो न (टूटे) पस अगर वह तुम्हारी मुतीइ हो जाएं तो तुम भी उनके नुक़सान की राह न ढूंढो ख़ुदा तो ज़रूर सबसे बरतर बुजुर्ग़ है
ऐ ईमानदारों तुमको ये जायज़ नहीं कि (अपने मुरिस की) औरतों से (निकाह कर) के (ख्वाह मा ख्वाह) ज़बरदस्ती वारिस बन जाओ और जो कुछ तुमने उन्हें (शौहर के तर्के से) दिया है उसमें से कुछ (आपस से कुछ वापस लेने की नीयत से) उन्हें दूसरे के साथ (निकाह करने से) न रोको हॉ जब वह खुल्लम खुल्ला कोई बदकारी करें तो अलबत्ता रोकने में (मज़ाएक़ा (हर्ज)नहीं) और बीवियों के साथ अच्छा सुलूक करते रहो और अगर तुम किसी वजह से उन्हें नापसन्द करो (तो भी सब्र करो क्योंकि) अजब नहीं कि किसी चीज़ को तुम नापसन्द करते हो और ख़ुदा तुम्हारे लिए उसमें बहुत बेहतरी कर दे
और उसी की (क़ुदरत) की निशानियों में से एक ये (भी) है कि उसने तुम्हारे वास्ते तुम्हारी ही जिन्स की बीवियाँ पैदा की ताकि तुम उनके साथ रहकर चैन करो और तुम लोगों के दरमेयान प्यार और उलफ़त पैदा कर दी इसमें शक नहीं कि इसमें ग़ौर करने वालों के वास्ते (क़ुदरते ख़ुदा की) यक़ीनी बहुत सी निशानियाँ हैं
स्रोत
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यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.