इस्लाम मर्द को चार पत्नियों तक से विवाह की इजाज़त देता है, लेकिन केवल इंसाफ़ की सख़्त शर्तों पर, और क़ुरआन चेताता है कि अगर किसी को डर हो कि वह इंसाफ़ न कर सकेगा तो केवल एक से विवाह करे। व्यवहार में आज मुस्लिम विवाहों का बड़ा बहुमत एक पत्नी वाला है।
विस्तृत जवाब
यह आयत उहुद की जंग के बाद उतरी, जब बहुत से मर्द शहीद हुए थे और बहुत सी विधवाओं और यतीमों को सुरक्षा की ज़रूरत थी। उस समय दुनिया में हर जगह बहुविवाह था और उसकी कोई सीमा नहीं थी; इस्लाम ने उसे चार तक सीमित किया और शर्तें जोड़ीं: ख़र्च, आवास और समय में बराबरी का बर्ताव, और क़ानून की रज़ामंदी। क़ुरआन ख़ुद कहता है कि पत्नियों के बीच पूरी बराबरी चाहे जितनी कोशिश करो नहीं हो सकती।
औरत अपने निकाह के अनुबंध में यह शर्त रख सकती है कि उसका पति दूसरी पत्नी नहीं करेगा, और यह ज़्यादातर मसलकों में माना जाता है। कुछ मुस्लिम-बहुल देशों, जैसे ट्यूनीशिया और तुर्किये, ने बहुविवाह पर पाबंदी लगाई है, और दूसरे अदालत या पत्नी की मंज़ूरी माँगते हैं। मुसलमान इस पर अलग राय रखते हैं कि आज इसका कितना व्यापक अभ्यास होना चाहिए।
और अगर तुमको अन्देशा हो कि (निकाह करके) तुम यतीम लड़कियों (की रखरखाव) में इन्साफ न कर सकोगे तो और औरतों में अपनी मर्ज़ी के मवाफ़िक दो दो और तीन तीन और चार चार निकाह करो (फिर अगर तुम्हें इसका) अन्देशा हो कि (मुततइद) बीवियों में (भी) इन्साफ न कर सकोगे तो एक ही पर इक्तेफ़ा करो या जो (लोंडी) तुम्हारी ज़र ख़रीद हो (उसी पर क़नाअत करो) ये तदबीर बेइन्साफ़ी न करने की बहुत क़रीने क़यास है
और अगरचे तुम बहुतेरा चाहो (लेकिन) तुममें इतनी सकत तो हरगिज़ नहीं है कि अपनी कई बीवियों में (पूरा पूरा) इन्साफ़ कर सको (मगर) ऐसा भी तो न करो कि (एक ही की तरफ़) हमातन माएल हो जाओ कि (दूसरी को अधड़ में) लटकी हुई छोड़ दो और अगर बाहम मेल कर लो और (ज्यादती से) बचे रहो तो ख़ुदा यक़ीनन बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.