क़ुरआन इस्लाम छोड़ने पर कोई दुनियावी सज़ा नहीं देता और कहता है कि दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं। शास्त्रीय आलिमों का मत था कि जब इर्तिदाद (धर्मत्याग) के साथ देशद्रोह या बग़ावत जुड़ी हो तो उसकी सज़ा मौत थी, और बहुत से आधुनिक आलिम कहते हैं कि इंसान की आस्था उसके और अल्लाह के बीच की बात है।
विस्तृत जवाब
क़ुरआन इर्तिदाद का कई बार ज़िक्र करता है और अगली ज़िंदगी की सज़ा की बात करता है, पर इस दुनिया की अदालतों में कभी नहीं। एक हदीस कहती है 'जो अपना दीन बदले, उसे क़त्ल कर दो', और बहुत से शास्त्रीय फ़क़ीहों ने इसे शब्दशः लिया, जबकि दूसरों, जैसे हनफ़ियों, ने इसे उन तक सीमित किया जो समुदाय से लड़ते हैं। बहुत से समकालीन आलिम तर्क देते हैं कि यह युद्ध के समय देशद्रोह पर लागू होती है, जहाँ इस्लाम छोड़ने का अर्थ दुश्मन से जा मिलना था।
व्यवहार में, कुछ देश क़ानूनन इर्तिदाद की सज़ा देते हैं, और कई दूसरे देशों में परिवार और समुदाय इस्लाम छोड़ने वालों पर दबाव डालते हैं। यह एक वास्तविक मामला है जिसमें बहुत से मुसलमान कहते हैं कि सुधार होना चाहिए, और दूसरे कहते हैं कि आयत 'दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं' किसी भी सज़ा को अनुचित बना देती है।
दीन में किसी तरह की जबरदस्ती नहीं क्योंकि हिदायत गुमराही से (अलग) ज़ाहिर हो चुकी तो जिस शख्स ने झूठे खुदाओं बुतों से इंकार किया और खुदा ही पर ईमान लाया तो उसने वो मज़बूत रस्सी पकड़ी है जो टूट ही नहीं सकती और ख़ुदा सब कुछ सुनता और जानता है
और (ऐ रसूल) तुम कह दों कि सच्ची बात (कलमए तौहीद) तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से (नाज़िल हो चुकी है) बस जो चाहे माने और जो चाहे न माने (मगर) हमने ज़ालिमों के लिए वह आग (दहका के) तैयार कर रखी है जिसकी क़नातें उन्हें घेर लेगी और अगर वह लोग दोहाई करेगें तो उनकी फरियाद रसी खौलते हुए पानी से की जाएगी जो मसलन पिघले हुए ताबें की तरह होगा (और) वह मुँह को भून डालेगा क्या बुरा पानी है और (जहन्नुम भी) क्या बुरी जगह है
बेशक जो लोग ईमान लाए उसके बाद फ़िर काफ़िर हो गए फिर ईमान लाए और फिर उसके बाद काफ़िर हो गये और कुफ़्र में बढ़ते चले गए तो ख़ुदा उनकी मग़फ़िरत करेगा और न उन्हें राहे रास्त की हिदायत ही करेगा
यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.