नहीं। पश्चिमी देशों के मुसलमानों का भारी बहुमत अपने ईमान के अनुसार निजी तौर पर जीना और देश के क़ानून का पालन करना चाहता है, जो इस्लाम उन्हें तब करना सिखाता है जब उन्हें सुरक्षा और इबादत का हक़ दिया गया हो। क़ुरआन कहता है कि दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं।
विस्तृत जवाब
इस्लामी शिक्षा मुसलमानों से कहती है कि अपने समझौते निभाएँ और जिस देश में वे शांति से रहते हैं उसके प्रति वफ़ादार रहें। पैग़ंबर ﷺ ने अपने कुछ अनुयायियों को हब्शा (एबिसीनिया) में एक ईसाई बादशाह के अधीन रहने भेजा, और उन्होंने क़ानूनों का पालन किया और साथ ही आज़ादी से अपने ईमान पर अमल करते रहे। आलिमों ने इसे अमन का अनुबंध कहा है।
कुछ जगहों पर कुछ मुस्लिम समूह अपने ही देश में इस्लामी क़ानून की माँग करते हैं, और मुसलमान आपस में इस पर असहमत हैं। लेकिन यह विचार कि पश्चिम में मुसलमान अपने नियम दूसरों पर थोपना चाहते हैं, ऐसा डर है जिसका मुस्लिम समुदायों के सर्वेक्षण समर्थन नहीं करते।
दीन में किसी तरह की जबरदस्ती नहीं क्योंकि हिदायत गुमराही से (अलग) ज़ाहिर हो चुकी तो जिस शख्स ने झूठे खुदाओं बुतों से इंकार किया और खुदा ही पर ईमान लाया तो उसने वो मज़बूत रस्सी पकड़ी है जो टूट ही नहीं सकती और ख़ुदा सब कुछ सुनता और जानता है
जो लोग तुमसे तुम्हारे दीन के बारे में नहीं लड़े भिड़े और न तुम्हें घरों से निकाले उन लोगों के साथ एहसान करने और उनके साथ इन्साफ़ से पेश आने से ख़ुदा तुम्हें मना नहीं करता बेशक ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है
ऐ ईमानदारों (अपने) इक़रारों को पूरा करो (देखो) तुम्हारे वास्ते चौपाए जानवर हलाल कर दिये गये उन के सिवा जो तुमको पढ़ कर सुनाए जाएंगे हलाल कर दिए गए मगर जब तुम हालते एहराम में हो तो शिकार को हलाल न समझना बेशक ख़ुदा जो चाहता है हुक्म देता है
यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.