قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلْفَلَقِ ﴿١﴾
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं सुबह के मालिक की
इस्लाम सिखाता है कि जादू और बुरी नज़र इस अर्थ में हक़ीक़त हैं कि अल्लाह उनके ज़रिए कुछ नुक़सान पहुँचने देता है, लेकिन अल्लाह की इजाज़त के बिना कुछ नहीं होता। जादू करना या भविष्यवक्ताओं के पास जाना हराम है, और हिफ़ाज़त नमाज़ और अल्लाह पर भरोसे से मिलती है।
क़ुरआन जादू का ज़िक्र फ़िरऔन के जादूगरों और हारूत व मारूत की कहानियों में करता है, और रिवायत है कि यह पैग़ंबर ﷺ पर आज़माया गया। क़ुरआन के आख़िरी दो अध्याय, अल-फ़लक़ और अन-नास, बुराई, हसद और वसवसों से अल्लाह की पनाह माँगने के लिए पढ़े जाते हैं। हदीस कहती है कि बुरी नज़र हक़ीक़त है।
मुसलमानों से कहा गया है कि ताबीज़ न पहनें और भविष्यवक्ताओं या ज्योतिषियों से न पूछें, क्योंकि वे ग़ैब का ऐसा इल्म जताते हैं जो केवल अल्लाह का है। मुस्लिम देशों में मिलने वाले बहुत से सांस्कृतिक रिवाज, जैसे नीली आँख के ताबीज़, लोक संस्कृति से आते हैं, इस्लाम की शिक्षाओं से नहीं।
قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلْفَلَقِ ﴿١﴾
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं सुबह के मालिक की
قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلنَّاسِ ﴿١﴾
(ऐ रसूल) तुम कह दो मैं लोगों के परवरदिगार
وَٱتَّبَعُوا۟ مَا تَتْلُوا۟ ٱلشَّيَٰطِينُ عَلَىٰ مُلْكِ سُلَيْمَٰنَ ۖ وَمَا كَفَرَ سُلَيْمَٰنُ وَلَٰكِنَّ ٱلشَّيَٰطِينَ كَفَرُوا۟ يُعَلِّمُونَ ٱلنَّاسَ ٱلسِّحْرَ وَمَآ أُنزِلَ عَلَى ٱلْمَلَكَيْنِ بِبَابِلَ هَٰرُوتَ وَمَٰرُوتَ ۚ وَمَا يُعَلِّمَانِ مِنْ أَحَدٍ حَتَّىٰ يَقُولَآ إِنَّمَا نَحْنُ فِتْنَةٌۭ فَلَا تَكْفُرْ ۖ فَيَتَعَلَّمُونَ مِنْهُمَا مَا يُفَرِّقُونَ بِهِۦ بَيْنَ ٱلْمَرْءِ وَزَوْجِهِۦ ۚ وَمَا هُم بِضَآرِّينَ بِهِۦ مِنْ أَحَدٍ إِلَّا بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۚ وَيَتَعَلَّمُونَ مَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنفَعُهُمْ ۚ وَلَقَدْ عَلِمُوا۟ لَمَنِ ٱشْتَرَىٰهُ مَا لَهُۥ فِى ٱلْءَاخِرَةِ مِنْ خَلَٰقٍۢ ۚ وَلَبِئْسَ مَا شَرَوْا۟ بِهِۦٓ أَنفُسَهُمْ ۚ لَوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ ﴿١٠٢﴾
जिसको सुलेमान के ज़माने की सलतनत में शयातीन जपा करते थे हालाँकि सुलेमान ने कुफ्र नहीं इख़तेयार किया लेकिन शैतानों ने कुफ्र एख़तेयार किया कि वह लोगों को जादू सिखाया करते थे और वह चीज़ें जो हारूत और मारूत दोनों फ़रिश्तों पर बाइबिल में नाज़िल की गई थी हालाँकि ये दोनों फ़रिश्ते किसी को सिखाते न थे जब तक ये न कह देते थे कि हम दोनों तो फ़क़त (ज़रियाए आज़माइश) है पस तो (इस पर अमल करके) बेईमान न हो जाना उस पर भी उनसे वह (टोटके) सीखते थे जिनकी वजह से मिया बीवी में तफ़रक़ा डालते हालाँकि बग़ैर इज्ने खुदावन्दी वह अपनी इन बातों से किसी को ज़रर नहीं पहुँचा सकते थे और ये लोग ऐसी बातें सीखते थे जो खुद उन्हें नुक़सान पहुँचाती थी और कुछ (नफा) पहुँचाती थी बावजूद कि वह यक़ीनन जान चुके थे कि जो शख्स इन (बुराईयों) का ख़रीदार हुआ वह आख़िरत में बेनसीब हैं और बेशुबह (मुआवज़ा) बहुत ही बड़ा है जिसके बदले उन्होंने अपनी जानों को बेचा काश (उसे कुछ) सोचे समझे होते
قُل لَّا يَعْلَمُ مَن فِى ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ٱلْغَيْبَ إِلَّا ٱللَّهُ ۚ وَمَا يَشْعُرُونَ أَيَّانَ يُبْعَثُونَ ﴿٦٥﴾
(ऐ रसूल इन से) कह दो कि जितने लोग आसमान व ज़मीन में हैं उनमे से कोई भी गैब की बात के सिवा नहीं जानता और वह भी तो नहीं समझते कि क़ब्र से दोबारा कब ज़िन्दा उठ खडे क़िए जाएँगें
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यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.