ٱلَّذِينَ إِذَآ أَصَٰبَتْهُم مُّصِيبَةٌۭ قَالُوٓا۟ إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّآ إِلَيْهِ رَٰجِعُونَ ﴿١٥٦﴾
कि जब उन पर कोई मुसीबत आ पड़ी तो वह (बेसाख्ता) बोल उठे हम तो ख़ुदा ही के हैं और हम उसी की तरफ लौट कर जाने वाले हैं
जीवन, मृत्यु और आख़िरत
मुसलमान को नहलाया जाता है, सादे सफ़ेद कपड़े (कफ़न) में लपेटा जाता है, समुदाय जनाज़े की नमाज़ पढ़ता है और उसे जल्द से जल्द, मक्का की ओर रुख़ करके, एक सादी क़ब्र में दफ़नाया जाता है। मुसलमान दाह-संस्कार नहीं करते।
जनाज़े की नमाज़ खड़े होकर पढ़ी जाती है, बिना रुकू और सजदे के, और मरने वाले के लिए अल्लाह से माफ़ी माँगी जाती है। शोक करने वालों को सब्र करने, 'हम अल्लाह के हैं और उसी की ओर लौटने वाले हैं' कहने और परिवार की मदद करने को कहा जाता है। तीन दिन तक परिवार से मिलने जाया जाता है और उन्हें खाना खिलाया जाता है।
इस्लाम सादे जनाज़े और क़ब्रें सिखाता है, दौलत के दिखावे के बिना। चीख़ना-चिल्लाना और चेहरा पीटना नापसंद है, लेकिन रोना स्वाभाविक है, जैसे पैग़ंबर ﷺ अपने बेटे की मौत पर रोए। मुसलमान मानते हैं कि मरने वाले को उसके नाम पर दिए दान, दुआओं और नेक संतान से फ़ायदा होता है।
ٱلَّذِينَ إِذَآ أَصَٰبَتْهُم مُّصِيبَةٌۭ قَالُوٓا۟ إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّآ إِلَيْهِ رَٰجِعُونَ ﴿١٥٦﴾
कि जब उन पर कोई मुसीबत आ पड़ी तो वह (बेसाख्ता) बोल उठे हम तो ख़ुदा ही के हैं और हम उसी की तरफ लौट कर जाने वाले हैं
كُلُّ نَفْسٍۢ ذَآئِقَةُ ٱلْمَوْتِ ۗ وَإِنَّمَا تُوَفَّوْنَ أُجُورَكُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَٰمَةِ ۖ فَمَن زُحْزِحَ عَنِ ٱلنَّارِ وَأُدْخِلَ ٱلْجَنَّةَ فَقَدْ فَازَ ۗ وَمَا ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَآ إِلَّا مَتَٰعُ ٱلْغُرُورِ ﴿١٨٥﴾
हर जान एक न एक (दिन) मौत का मज़ा चखेगी और तुम लोग क़यामत के दिन (अपने किए का) पूरा पूरा बदला भर पाओगे पस जो शख्स जहन्नुम से हटा दिया गया और बहिश्त में पहुंचा दिया गया पस वही कामयाब हुआ और दुनिया की (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी धोखे की टट्टी के सिवा कुछ नहीं
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यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.