मुसलमान इसे नकारते हैं। क़ुरआन बहुत से ऐसे नबियों का ज़िक्र करता है जो बाइबिल में भी हैं, पर वह अक्सर कहानी अलग ढंग से बताता है और उसे सही करता है जिसे मुसलमान पहले की किताबों में किया गया बदलाव मानते हैं। मुहम्मद ﷺ पढ़ नहीं सकते थे, और उनके समय कोई अरबी बाइबिल मौजूद नहीं थी।
विस्तृत जवाब
7वीं सदी के मक्का में बाइबिल का कोई पूरा अरबी अनुवाद नहीं था। पैग़ंबर ﷺ अनपढ़ जाने जाते थे, और उनकी क़ौम ने, जो उनकी विरोधी थी, उन पर आरोप लगाया कि वे किसी आदमी से मदद लेते हैं, और क़ुरआन जवाब देता है कि जिसकी ओर वे इशारा करते हैं उसकी भाषा अजमी (विदेशी) है, जबकि यह साफ़ अरबी है।
क़ुरआन नक़ल होने का दावा नहीं करता: वह कहता है कि वह पहले की किताबों की सच्ची बातों की पुष्टि करता है और उन पर कसौटी है। उसमें ऐसी कहानियाँ हैं जो बाइबिल में नहीं मिलतीं, जैसे आद और समूद की क़ौमें, और वह इब्राहीम के काबा बनाने की कहानी, ईसा की हक़ीक़त और दूसरी बातों में बाइबिल से अलग है। इस्लाम में समानता की वजह एक ही स्रोत है: वही अल्लाह।
और (ऐ रसूल) हम तहक़ीक़तन जानते हैं कि ये कुफ्फार तुम्हारी निस्बत कहा करते है कि उनको (तुम को) कोई आदमी क़ुरान सिखा दिया करता है हालॉकि बिल्कुल ग़लत है क्योंकि जिस शख्स की तरफ से ये लोग निस्बत देते हैं उसकी ज़बान तो अजमी है और ये तो साफ साफ अरबी ज़बान है
और (ऐ रसूल) हमने तुम पर भी बरहक़ किताब नाज़िल की जो किताब (उसके पहले से) उसके वक्त में मौजूद है उसकी तसदीक़ करती है और उसकी निगेहबान (भी) है जो कुछ तुम पर ख़ुदा ने नाज़िल किया है उसी के मुताबिक़ तुम भी हुक्म दो और जो हक़ बात ख़ुदा की तरफ़ से आ चुकी है उससे कतरा के उन लोगों की ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो और हमने तुम में हर एक के वास्ते (हस्बे मसलेहते वक्त) एक एक शरीयत और ख़ास तरीक़े पर मुक़र्रर कर दिया और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम सब के सब को एक ही (शरीयत की) उम्मत बना देता मगर (मुख़तलिफ़ शरीयतों से) ख़ुदा का मतलब यह था कि जो कुछ तुम्हें दिया है उसमें तुम्हारा इमतेहान करे बस तुम नेकी में लपक कर आगे बढ़ जाओ और (यक़ीन जानो कि) तुम सब को ख़ुदा ही की तरफ़ लौट कर जाना है
यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.