नहीं। क़ुरआन कहता है कि ईसा न क़त्ल किए गए और न सूली पर चढ़ाए गए, बल्कि लोगों को ऐसा ही दिखाया गया, जबकि अल्लाह ने उन्हें अपनी ओर उठा लिया। मुसलमान मानते हैं कि वे क़यामत के दिन से पहले धरती पर लौटेंगे।
विस्तृत जवाब
क़ुरआन यह नहीं बताता कि उनकी जगह किसे या क्या दिखाया गया, और मुसलमानों को यह जानने की ज़रूरत भी नहीं। उनका विश्वास आयत के अपने कथन पर टिका है: उन्होंने उसे न क़त्ल किया और न सूली पर चढ़ाया, बल्कि उन्हें ऐसा ही भ्रम हुआ।
इस्लाम यह भी सिखाता है कि कोई जान किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाती, इसलिए माफ़ी पाने के लिए इंसान को किसी क़ुर्बानी की ज़रूरत नहीं। जो सच्चे दिल से तौबा करे उसे अल्लाह, जो सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है, सीधे माफ़ कर देता है। यह उस ईसाई विश्वास से एक अंतर है कि सूली ही मुक्ति का साधन है, और मुसलमान इसके बारे में आदर के साथ बात करते हैं।
और उनके यह कहने की वजह से कि हमने मरियम के बेटे ईसा (स.) ख़ुदा के रसूल को क़त्ल कर डाला हालॉकि न तो उन लोगों ने उसे क़त्ल ही किया न सूली ही दी उनके लिए (एक दूसरा शख्स ईसा) से मुशाबेह कर दिया गया और जो लोग इस बारे में इख्तेलाफ़ करते हैं यक़ीनन वह लोग (उसके हालत) की तरफ़ से धोखे में (आ पड़े) हैं उनको उस (वाक़िये) की ख़बर ही नहीं मगर फ़क्त अटकल के पीछे (पड़े) हैं और ईसा को उन लोगों ने यक़ीनन क़त्ल नहीं किया बल्कि ख़ुदा ने उन्हें अपनी तरफ़ उठा लिया और ख़ुदा तो बड़ा ज़बरदस्त तदबीर वाला है
और यहूदियों (ने ईसा से) मक्कारी की और ख़ुदा ने उसके दफ़ईया की तदबीर की और ख़ुदा सब से बेहतर तदबीर करने वाला है (वह वक्त भी याद करो) जब ईसा से ख़ुदा ने फ़रमाया ऐ ईसा मैं ज़रूर तुम्हारी ज़िन्दगी की मुद्दत पूरी करके तुमको अपनी तरफ़ उठा लूंगा और काफ़िरों (की ज़िन्दगी) से तुमको पाक व पाकीज़ा रखूंगा और जिन लोगों ने तुम्हारी पैरवी की उनको क़यामत तक काफ़िरों पर ग़ालिब रखूंगा फिर तुम सबको मेरी तरफ़ लौटकर आना है
यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.