मुसलमान मानते हैं कि जन्नत या जहन्नम में कौन जाएगा यह केवल अल्लाह तय करता है, और वह पूरे इंसाफ़ और रहमत के साथ फ़ैसला करता है। किसी मुसलमान को यह कहने का हक़ नहीं कि कोई ख़ास इंसान जहन्नम में है।
विस्तृत जवाब
क़ुरआन कहता है कि जो इस्लाम के सिवा कोई और दीन चाहे, वह उससे क़बूल नहीं किया जाएगा, और यह भी कहता है कि अल्लाह किसी क़ौम को तब तक सज़ा नहीं देता जब तक उनके पास कोई रसूल साफ़ संदेश के साथ न आ जाए। आलिम समझाते हैं कि जिन तक इस्लाम का संदेश कभी साफ़ तौर पर नहीं पहुँचा, या बिगड़े रूप में पहुँचा, उनकी क़यामत के दिन परीक्षा होगी और उनका इंसाफ़ से फ़ैसला होगा। क़ुरआन यहूदियों, ईसाइयों और साबियों के उन समूहों का भी ज़िक्र करता है जो अल्लाह और आख़िरी दिन पर ईमान रखते और नेक काम करते हैं, और कहता है कि उनका बदला उनके लिए है।
पैग़ंबर ﷺ ने सिखाया कि अल्लाह की रहमत उसके ग़ुस्से पर भारी है। इसलिए मुसलमान सबके लिए रहमत की उम्मीद रखते हैं, लोगों को नरमी के साथ इस्लाम की दावत देते हैं, और अंतिम फ़ैसला अल्लाह पर छोड़ते हैं। मुसलमान यह ज़रूर मानते हैं कि सच जान लेने के बाद उसे ठुकराना एक गंभीर बात है।
और हम तो उसी (यकता ख़ुदा) के फ़रमाबरदार हैं और जो शख्स इस्लाम के सिवा किसी और दीन की ख्वाहिश करे तो उसका वह दीन हरगिज़ कुबूल ही न किया जाएगा और वह आख़िरत में सख्त घाटे में रहेगा
जो शख़्श रुबरु होता है तो बस अपने फायदे के लिए यह पर आता है और जो शख़्श गुमराह होता है तो उसने भटक कर अपना आप बिगाड़ा और कोई शख़्श किसी दूसरे (के गुनाह) का बोझ अपने सर नहीं लेगा और हम तो जब तक रसूल को भेजकर तमाम हुज्जत न कर लें किसी पर अज़ाब नहीं किया करते
बेशक मुसलमानों और यहूदियों और नसरानियों और ला मज़हबों में से जो कोई खुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान लाए और अच्छे-अच्छे काम करता रहे तो उन्हीं के लिए उनका अज्र व सवाब उनके खुदा के पास है और न (क़यामत में) उन पर किसी का ख़ौफ होगा न वह रंजीदा दिल होंगे
और तू ही इस दुनिया (फ़ानी) और आख़िरत में हमारे वास्ते भलाई के लिए लिख ले हम तेरी ही तरफ रूझू करते हैं ख़ुदा ने फरमाया जिसको मैं चाहता हूँ (मुस्तहक़ समझकर) अपना अज़ाब पहुँचा देता हूँ और मेरी रहमत हर चीज़ पर छाई हैं मै तो उसे बहुत जल्द ख़ास उन लोगों के लिए लिख दूँगा (जो बुरी बातों से) बचते रहेंगे और ज़कात दिया करेंगे और जो हमारी बातों पर ईमान रखा करेंगें
यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.