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क़ुरआन और पैग़ंबर

पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ ने लोगों के साथ बर्ताव के बारे में क्या सिखाया?

संक्षिप्त जवाब

उन्होंने सबके साथ भलाई सिखाई: माता-पिता, पड़ोसियों, ग़रीबों, यतीमों, जानवरों और यहाँ तक कि अजनबियों के साथ। उन्होंने फ़रमाया, 'तुममें सबसे अच्छे वे हैं जिनका अख़लाक़ सबसे अच्छा है,' और यह कि तुममें से कोई सच्चा ईमान वाला नहीं हो सकता जब तक वह अपने भाई के लिए वही न चाहे जो अपने लिए चाहता है।

विस्तृत जवाब

उन्होंने सिखाया कि ईमान वाला अपने पड़ोसी को तकलीफ़ नहीं देता, किसी की ओर मुस्कुराना सदक़ा है, एक इंसान को प्यासे कुत्ते को पानी पिलाने पर माफ़ कर दिया गया, और दूसरे को एक बिल्ली को बाँध रखने पर सज़ा मिली। उन्होंने फ़रमाया कि जिब्रील पड़ोसी के बारे में इतनी बार नसीहत करते रहे कि उन्हें लगा पड़ोसी को वारिस बना दिया जाएगा।

उन्होंने मुसलमानों से कहा कि भूखे को खाना खिलाओ, सलाम को आम करो, नौकरों के साथ भाई-बहनों जैसा बर्ताव करो, व्यापार में कभी धोखा न दो और अच्छी बात बोलो या चुप रहो। जब उन्होंने मक्का जीता, उस शहर को जिसने सालों उन्हें सताया था, तो कहा: 'जाओ, तुम आज़ाद हो', और माफ़ कर दिया। मुसलमान अपने रोज़मर्रा के जीवन में इसी आदर्श पर चलने की कोशिश करते हैं।

क़ुरआन से

۞ وَٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ وَلَا تُشْرِكُوا۟ بِهِۦ شَيْـًۭٔا ۖ وَبِٱلْوَٰلِدَيْنِ إِحْسَٰنًۭا وَبِذِى ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْيَتَٰمَىٰ وَٱلْمَسَٰكِينِ وَٱلْجَارِ ذِى ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْجَارِ ٱلْجُنُبِ وَٱلصَّاحِبِ بِٱلْجَنۢبِ وَٱبْنِ ٱلسَّبِيلِ وَمَا مَلَكَتْ أَيْمَٰنُكُمْ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ مَن كَانَ مُخْتَالًۭا فَخُورًا ﴿٣٦﴾

और ख़ुदा ही की इबादत करो और किसी को उसका शरीक न बनाओ और मॉ बाप और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजों और रिश्तेदार पड़ोसियों और अजनबी पड़ोसियों और पहलू में बैठने वाले मुसाहिबों और पड़ोसियों और ज़र ख़रीद लौन्डी और गुलाम के साथ एहसान करो बेशक ख़ुदा अकड़ के चलने वालों और शेख़ीबाज़ों को दोस्त नहीं रखता

وَلَا تُصَعِّرْ خَدَّكَ لِلنَّاسِ وَلَا تَمْشِ فِى ٱلْأَرْضِ مَرَحًا ۖ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخْتَالٍۢ فَخُورٍۢ ﴿١٨﴾

और लोगों के सामने (गुरुर से) अपना मुँह न फुलाना और ज़मीन पर अकड़कर न चलना क्योंकि ख़ुदा किसी अकड़ने वाले और इतराने वाले को दोस्त नहीं रखता और अपनी चाल ढाल में मियाना रवी एख्तेयार करो

۞ إِنَّ ٱللَّهَ يَأْمُرُ بِٱلْعَدْلِ وَٱلْإِحْسَٰنِ وَإِيتَآئِ ذِى ٱلْقُرْبَىٰ وَيَنْهَىٰ عَنِ ٱلْفَحْشَآءِ وَٱلْمُنكَرِ وَٱلْبَغْىِ ۚ يَعِظُكُمْ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ ﴿٩٠﴾

इसमें शक़ नहीं कि ख़ुदा इन्साफ और (लोगों के साथ) नेकी करने और क़राबतदारों को (कुछ) देने का हुक्म करता है और बदकारी और नाशाएस्ता हरकतों और सरकशी करने को मना करता है (और) तुम्हें नसीहत करता है ताकि तुम नसीहत हासिल करो

स्रोत

इस जवाब के पीछे की हदीसें और रिवायतें। किसी नंबर को खोलकर उसे sunnah.com पर पढ़ें।

  • Sahih al-Bukhari 3559 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
  • Sahih al-Bukhari 13 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
  • Sahih al-Bukhari 6015 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
  • Jami' at-Tirmidhi 1956 Sahih (Al-Albani)
  • Sahih al-Bukhari 6009 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
  • Sahih al-Bukhari 3318 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
  • The pardon at the conquest of Mecca: Ibn Hisham, as-Sirah an-Nabawiyyah.
कृपया ध्यान दें

यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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