इस्लाम ऐसे सिद्धांत सिखाता है जो मानवाधिकारों के बहुत से पहलुओं का समर्थन करते हैं: हर इंसान की गरिमा, इंसाफ़, शासन के मामलों में मशविरा और जान, माल, ईमान, परिवार और अक़्ल की हिफ़ाज़त। मुसलमान इस पर अलग राय रखते हैं कि राजनीतिक व्यवस्था में इन्हें सबसे अच्छी तरह कैसे व्यक्त किया जाए।
विस्तृत जवाब
क़ुरआन उनकी तारीफ़ करता है 'जिनके मामले आपस में मशविरे से होते हैं', और मुसलमानों से कहता है कि लोगों के बीच इंसाफ़ से फ़ैसला करें। शुरुआती ख़लीफ़ा मशविरे से चुने जाते थे और लोगों को उन्हें टोकने का हक़ था। इंडोनेशिया, तुर्किये, बांग्लादेश और मलेशिया सहित कई मुस्लिम-बहुल देशों में चुनाव होते हैं, और मुस्लिम आलिमों ने उसके ख़ास रूपों के पक्ष और विपक्ष दोनों में तर्क दिए हैं।
कुछ बिंदुओं पर, जैसे औरतों के साथ बर्ताव, आस्था की आज़ादी और सज़ाएँ, मुस्लिम चिंतक बहस करते हैं कि इस्लाम और आधुनिक मानवाधिकार घोषणाएँ कितनी हद तक सहमत हैं। 1990 में इस्लामी सहयोग संगठन के सदस्य देशों ने इस्लाम में मानवाधिकारों पर क़ाहिरा घोषणा को अपने ढाँचे के रूप में अपनाया।
और जो अपने परवरदिगार का हुक्म मानते हैं और नमाज़ पढ़ते हैं और उनके कुल काम आपस के मशवरे से होते हैं और जो कुछ हमने उन्हें अता किया है उसमें से (राहे ख़ुदा में) ख़र्च करते हैं
ऐ ईमानदारों ख़ुदा तुम्हें हुक्म देता है कि लोगों की अमानतें अमानत रखने वालों के हवाले कर दो और जब लोगों के बाहमी झगड़ों का फैसला करने लगो तो इन्साफ़ से फैसला करो (ख़ुदा तुमको) इसकी क्या ही अच्छी नसीहत करता है इसमें तो शक नहीं कि ख़ुदा सबकी सुनता है (और सब कुछ) देखता है
और हमने यक़ीनन आदम की औलाद को इज्ज़त दी और खुश्की और तरी में उनको (जानवरों कश्तियों के ज़रिए) लिए लिए फिरे और उन्हें अच्छी अच्छी चीज़ें खाने को दी और अपने बहुतेरे मख़लूक़ात पर उनको अच्छी ख़ासी फज़ीलत दी
यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.