وَٱلْعَصْرِ ﴿١﴾
नमाज़े अस्र की क़सम
क़ुरआन की 103वीं सूरत
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
وَٱلْعَصْرِ ﴿١﴾
नमाज़े अस्र की क़सम
إِنَّ ٱلْإِنسَٰنَ لَفِى خُسْرٍ ﴿٢﴾
बेशक इन्सान घाटे में है
إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّٰلِحَٰتِ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلْحَقِّ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلصَّبْرِ ﴿٣﴾
मगर जो लोग ईमान लाए, और अच्छे काम करते रहे और आपस में हक़ का हुक्म और सब्र की वसीयत करते रहे
अरबी पाठ: उस्मानी लिपि। अनुवाद: Suhel Farooq Khan and Saifur Rahman Nadwi। ऑडियो: everyayah.com।
सूरह Al-'Asr (العصر) क़ुरआन की 103वीं सूरत है। इसमें 3 आयतें हैं और यह पारा 30 में है। इसे मक्की सूरत माना जाता है, यानी यह मुख्यतः नबी ﷺ की मदीना हिजरत से पहले उतरी।
इसका नाम, العصر, अरबी में इस सूरत की पहचान है।
सूरह Al-'Asr में 3 आयतें हैं।
वर्गीकरण: मक्की।
सूरह Al-'Asr पारा 30 में है।
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