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मुसलमान बनना

अगर मैं मुसलमान बनूँ तो अपने परिवार को कैसे बताऊँ?

संक्षिप्त जवाब

अपना समय लें, धैर्य रखें और अपने व्यवहार से दिखाएँ कि आप वही प्यार करने वाले इंसान हैं। इस्लाम माता-पिता के साथ भलाई का हुक्म देता है, ग़ैर-मुस्लिम माता-पिता के साथ भी, और नए मुसलमान को रिश्ते नहीं तोड़ने चाहिए।

विस्तृत जवाब

क़ुरआन इंसान से कहता है कि माता-पिता के साथ भलाई करो, चाहे वे तुम पर अल्लाह के साथ शरीक ठहराने का दबाव डालें: उस बात में उनकी बात न मानो, लेकिन इस दुनिया में उनके साथ भलाई से रहो। बहुत से नए मुसलमान पाते हैं कि समय के साथ परिवार की चिंताएँ दूर हो जाती हैं जब वे देखते हैं कि इस्लाम ने उन्हें ज़्यादा भला, ज़्यादा कर्तव्यनिष्ठ और ज़्यादा ज़िम्मेदार बनाया है।

कोई शांत क्षण चुनें, अपने कारण सरल शब्दों में समझाएँ और उन्हें भरोसा दिलाएँ कि आप अब भी उनसे प्यार करते हैं। उपदेश न दें और बहस से बचें। अगर आपका परिवार विरोधी है, तो अपने स्थानीय मुस्लिम समुदाय का सहयोग लें और धैर्य रखें, क्योंकि बहुत से लोग इसी से गुज़रे हैं और पाया है कि उनके परिवार उनके फ़ैसले का आदर करने लगे।

क़ुरआन से

وَإِن جَٰهَدَاكَ عَلَىٰٓ أَن تُشْرِكَ بِى مَا لَيْسَ لَكَ بِهِۦ عِلْمٌۭ فَلَا تُطِعْهُمَا ۖ وَصَاحِبْهُمَا فِى ٱلدُّنْيَا مَعْرُوفًۭا ۖ وَٱتَّبِعْ سَبِيلَ مَنْ أَنَابَ إِلَىَّ ۚ ثُمَّ إِلَىَّ مَرْجِعُكُمْ فَأُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴿١٥﴾

और अगर तेरे माँ बाप तुझे इस बात पर मजबूर करें कि तू मेरा शरीक ऐसी चीज़ को क़रार दे जिसका तुझे इल्म भी नहीं तो तू (इसमें) उनकी इताअत न करो (मगर तकलीफ़ न पहुँचाना) और दुनिया (के कामों) में उनका अच्छी तरह साथ दे और उन लोगों के तरीक़े पर चल जो (हर बात में) मेरी (ही) तरफ रुजू करे फिर (तो आख़िर) तुम सबकी रुजू मेरी ही तरफ है तब (दुनिया में) जो कुछ तुम करते थे

۞ وَقَضَىٰ رَبُّكَ أَلَّا تَعْبُدُوٓا۟ إِلَّآ إِيَّاهُ وَبِٱلْوَٰلِدَيْنِ إِحْسَٰنًا ۚ إِمَّا يَبْلُغَنَّ عِندَكَ ٱلْكِبَرَ أَحَدُهُمَآ أَوْ كِلَاهُمَا فَلَا تَقُل لَّهُمَآ أُفٍّۢ وَلَا تَنْهَرْهُمَا وَقُل لَّهُمَا قَوْلًۭا كَرِيمًۭا ﴿٢٣﴾

और तुम्हारे परवरदिगार ने तो हुक्म ही दिया है कि उसके सिवा किसी दूसरे की इबादत न करना और माँ बाप से नेकी करना अगर उनमें से एक या दोनों तेरे सामने बुढ़ापे को पहुँचे (और किसी बात पर खफा हों) तो (ख़बरदार उनके जवाब में उफ तक) न कहना और न उनको झिड़कना और जो कुछ कहना सुनना हो तो बहुत अदब से कहा करो

وَوَصَّيْنَا ٱلْإِنسَٰنَ بِوَٰلِدَيْهِ حُسْنًۭا ۖ وَإِن جَٰهَدَاكَ لِتُشْرِكَ بِى مَا لَيْسَ لَكَ بِهِۦ عِلْمٌۭ فَلَا تُطِعْهُمَآ ۚ إِلَىَّ مَرْجِعُكُمْ فَأُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴿٨﴾

और हमने इन्सान को अपने माँ बाप से अच्छा बरताव करने का हुक्म दिया है और (ये भी कि) अगर तुझे तेरे माँ बाप इस बात पर मजबूर करें कि ऐसी चीज़ को मेरा शरीक बना जिन (के शरीक होने) का मुझे इल्म तक नहीं तो उनका कहना न मानना तुम सबको (आख़िर एक दिन) मेरी तरफ लौट कर आना है मै जो कुछ तुम लोग (दुनिया में) करते थे बता दूँगा

कृपया ध्यान दें

यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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