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मुसलमान बनना

अगर अतीत में मैंने बहुत बुरे काम किए हैं तो क्या मैं मुसलमान बन सकता हूँ?

संक्षिप्त जवाब

जी हाँ। इस्लाम में ईमान क़बूल करना और सच्ची तौबा अतीत को मिटा देते हैं, और कोई गुनाह अल्लाह की माफ़ी के लिए बहुत बड़ा नहीं। क़ुरआन उन लोगों से जिन्होंने अपने ऊपर ज़ुल्म किया कहता है कि अल्लाह की रहमत से निराश न हों।

विस्तृत जवाब

पैग़ंबर ﷺ ने सिखाया कि इस्लाम उसे मिटा देता है जो उससे पहले था। एक प्रसिद्ध क़िस्सा उस आदमी का है जिसने निन्यानवे लोगों को क़त्ल किया था और पूछा कि क्या उसे माफ़ किया जा सकता है, और उससे कहा गया कि उसके और तौबा के बीच कुछ आड़े नहीं आता। पैग़ंबर ﷺ के वे साथी जिन्होंने पहले मुसलमानों को नुक़सान पहुँचाया था, जैसे ख़ालिद बिन वलीद और उमर, सबसे अच्छे मुसलमानों में गिने गए।

तौबा के लिए पछतावा, गुनाह रोकना, उसकी ओर न लौटने का संकल्प और, अगर दूसरों के साथ ग़लत हुआ हो, तो उसकी भरपाई ज़रूरी है। मुसलमान मानते हैं कि तौबा का दरवाज़ा तब तक खुला रहता है जब तक मौत के समय रूह गले तक न पहुँचे या सूरज पश्चिम से न निकले।

क़ुरआन से

۞ قُلْ يَٰعِبَادِىَ ٱلَّذِينَ أَسْرَفُوا۟ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا۟ مِن رَّحْمَةِ ٱللَّهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يَغْفِرُ ٱلذُّنُوبَ جَمِيعًا ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ ﴿٥٣﴾

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ मेरे (ईमानदार) बन्दों जिन्होने (गुनाह करके) अपनी जानों पर ज्यादतियाँ की हैं तुम लोग ख़ुदा की रहमत से नाउम्मीद न होना बेशक ख़ुदा (तुम्हारे) कुल गुनाहों को बख्श देगा वह बेशक बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है

إِلَّا مَن تَابَ وَءَامَنَ وَعَمِلَ عَمَلًۭا صَٰلِحًۭا فَأُو۟لَٰٓئِكَ يُبَدِّلُ ٱللَّهُ سَيِّـَٔاتِهِمْ حَسَنَٰتٍۢ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا ﴿٧٠﴾

मगर (हाँ) जिस शख्स ने तौबा की और ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए तो (अलबत्ता) उन लोगों की बुराइयों को ख़ुदा नेकियों से बदल देगा और ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है

وَمَن يَعْمَلْ سُوٓءًا أَوْ يَظْلِمْ نَفْسَهُۥ ثُمَّ يَسْتَغْفِرِ ٱللَّهَ يَجِدِ ٱللَّهَ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا ﴿١١٠﴾

और जो शख्स कोई बुरा काम करे या (किसी तरह) अपने नफ्स पर ज़ुल्म करे उसके बाद ख़ुदा से अपनी मग़फ़िरत की दुआ मॉगे तो ख़ुदा को बड़ा बख्शने वाला मेहरबान पाएगा

स्रोत

इस जवाब के पीछे की हदीसें और रिवायतें। किसी नंबर को खोलकर उसे sunnah.com पर पढ़ें।

  • Sahih al-Bukhari 3470 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
  • Sahih Muslim 121 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
कृपया ध्यान दें

यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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